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Publish Date: June 30, 2026

रुपिन पास ट्रेक 2026: आई.आई.टी. दिल्ली ने रचा नया कीर्तिमान

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15,279 फीट की ऊँचाई, विरल होती ऑक्सीजन और चारों ओर फैले बर्फीले विस्तार के बीच, इस मई माह में आई.आई.टी. दिल्ली हाइकिंग क्लब के 15 सदस्यों ने रूपिन पास ट्रेक सफलतापूर्वक पूरा किया। वे किसी परिचित अभियान पर निकले अनुभवी पर्वतारोही नहीं थे, बल्कि वे विद्यार्थी थे, जो संस्थान के पहले उच्च हिमालयी ट्रेक का हिस्सा बने थे। यह केवल एक ट्रेक नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक शुरुआत थी—जहाँ उठाया गया हर कदम साहस, संकल्प और नई राह बनाने की कहानी कह रहा था।

12 से 20 मई के बीच इंडियाहाइक्स के सहयोग से आयोजित रुपिन पास ट्रेक केवल एक साहसिक गतिविधि नहीं थी, बल्कि यह आई.आई.टी. दिल्ली के विद्यार्थियों की संगठनात्मक क्षमता, अनुशासित तैयारी और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में उत्कृष्ट प्रदर्शन का परिचायक भी था। हिमाचल प्रदेश के दुर्गम पर्वतीय मार्गों—रोडोडेंड्रॉन के जंगलों, पहाड़ी गाँवों, हिमनदीय जलधाराओं और बर्फ से ढकी पर्वतीय धारों—को पार करते हुए प्रतिभागियों ने इस कठिन अभियान को सफलतापूर्वक पूरा किया।

इस ऐतिहासिक पहल का बीज स्वयं विद्यार्थियों ने बोया था। हाइकिंग क्लब के सदस्यों ने आई.आई.टी. दिल्ली में व्यवस्थित आउटडोर गतिविधियों और पर्वतीय अभियानों की एक नई परंपरा स्थापित करने का संकल्प लिया। प्रो. जय धारीवाल और प्रो. सुमा आत्रेय के संरक्षण, ट्रेक लीडर सौरभ शाह के नेतृत्व तथा स्टाफ मेंटर भाग्य वर्धन के सतत सहयोग ने इस संकल्प को हकीकत में बदल दिया।

इस अभियान की सफलता के पीछे सुनियोजित और कठोर तैयारी की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। प्रतिभागियों ने भारतीय नौसेना के कमांडर तथा आई.आई.टी. दिल्ली के अनुप्रयुक्त यांत्रिकी विभाग में सहायक संकाय सदस्य (एडजंक्ट फैकल्टी) कमांडर सुबीर कुमार सिंह के मार्गदर्शन में गहन प्रशिक्षण प्राप्त किया। इस प्रशिक्षण का केंद्र शारीरिक सहनशक्ति बढ़ाने और मानसिक दृढ़ता विकसित करने पर था। इसके अलावा, आयोजित ओरिएंटेशन सत्रों में ऊँचाई वाले क्षेत्रों में अनुकूलन, सुरक्षा उपायों, आवश्यक उपकरणों के सही उपयोग तथा पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार व्यवहार जैसे महत्त्वपूर्ण विषयों, जिनका महत्त्व 15,000 फीट से अधिक की ऊँचाई पर और भी बढ़ जाता है, पर विस्तार से जानकारी दी गई।

इस ट्रेक ने प्रतिभागियों की हर क्षमता की परीक्षा ली। उन्हें हिमनदों से निकलने वाली जलधाराओं पर बने बर्फ के प्राकृतिक पुलों को पार करना पड़ा, जंगली फूलों से सजे अल्पाइन घास के मैदानों से होकर गुजरना पड़ा और पर्वत की ढलान से मानो चिपके हुए प्रसिद्ध जाखा गाँव तक पहुँचना पड़ा। अभियान का सबसे कठिन चरण शिखर दिवस की भोर से पहले शुरू हुआ, जब तीखी बर्फीली ढलानों और विरल होती हवा के बीच उन्हें ऐसी चढ़ाई करनी पड़ी, जहाँ हर कदम और हर साँस बेहद मायने रखती थी।

इस अभियान की सबसे बड़ी खासियत इसकी ऊँचाई या लंबी दूरी नहीं थी, बल्कि यह थी कि सभी 15 प्रतिभागियों ने इसे सुरक्षित रूप से पूरा किया। यह महज़ संयोग नहीं था, बल्कि प्रभावी नेतृत्व, सुनियोजित तैयारी और पूरी टीम की उस प्रतिबद्धता का परिणाम था, जिसके केंद्र में हर सदस्य को सुरक्षित शिखर तक पहुँचाना था। व्यक्तिगत उपलब्धि से कहीं बढ़कर, इस अभियान ने प्रतिभागियों को ऐसी अमूल्य सीख और अनुभव दिए जिन्हें शब्दों या आँकड़ों में नहीं मापा जा सकता। वास्तविक परिस्थितियों में तपकर निखरी दृढ़ता, साझा संघर्ष से अर्जित आत्मविश्वास और यह अटूट विश्वास कि वे मिलकर किसी भी चुनौतीपूर्ण लक्ष्य को सफलतापूर्वक हासिल कर सकते हैं—यही इस अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धियाँ रहीं।

रूपिन पास ट्रेक इन 14 विद्यार्थियों और एक स्टाफ सदस्य के लिए मात्र एक स्मृति नहीं रहा, बल्कि एक मजबूत आधार बन गया है। यह आई.आई.टी. दिल्ली समुदाय के लिए इस बात का संकेत है कि उच्च हिमालयी पर्वतारोहण अब संस्थान की संस्कृति का हिस्सा है और यह भावी पीढ़ियों को इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।