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Publish Date: May 7, 2026

आई.आई.टी. दिल्ली संस्थान में ‘जय भीम सप्ताह 2026’ का आयोजन: डॉ. भीमराव अंबेडकर की विरासत को समर्पित चिंतन, संवाद और सहभागिता का एक सप्ताह

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फोटो कैप्शन: (डॉ. बी.आर. अंबेडकर की 136वीं जयंती का आयोजन)

नई दिल्ली: आई.आई.टी. दिल्ली संस्थान ने डॉ. बी.आर. अंबेडकर की 136वीं जयंती के उपलक्ष्य में 10 से 16 अप्रैल 2026 तक “जय भीम सप्ताह 2026” का आयोजन किया। इस कार्यक्रम ने परिसर में समानता, गरिमा और सामाजिक समावेशन पर आधारित विषयों पर संवाद, रचनात्मकता और गहन चर्चा का एक उत्साही वातावरण तैयार किया।

इस वर्ष के समारोह का मुख्य आकर्षण ‘जय भीम सप्ताह फिल्म फेस्टिवल’ (10-12 अप्रैल) था, जिसने सिनेमा को सामाजिक न्याय से जुड़े सवालों पर विचार-विमर्श करने के एक शक्तिशाली माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया।

जय भीम सप्ताह की शुरुआत ब्लड कनेक्ट और एन.एस.एस. के सहयोग से आयोजित रक्तदान शिविर से हुई। इस शिविर में 200 से अधिक उत्साही प्रतिभागियों ने रक्तदान किया। संस्थान के केंद्रीय पुस्तकालय में एक पुस्तक प्रदर्शनी का आयोजन किया गया । साथ ही इस दौरान केंद्रीय पुस्तकालय में 300 से अधिक स्कूली विद्यार्थियों ने भ्रमण किया । इस पुस्तक प्रदर्शनी में डॉ. अंबेडकर के जीवन और विचारों से इन विद्यार्थियों को अवगत करवाया गया। 


फोटो कैप्शन: (तस्वीर: केंद्रीय पुस्तकालय द्वारा आयोजित डॉ. अंबेडकर विषयक प्रदर्शनी देखने आए स्कूली विद्यार्थियों से बातचीत करते हुए प्रो. अरविंद कुमार नेमा, उप निदेशक (प्रचालन), आई.आई.टी. दिल्ली)

फिल्म महोत्सव: सामाजिक समावेशन के रूप में सिनेमा 
फिल्म महोत्सव के उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता प्रो. अरविंद नेमा (उप निदेशक, प्रचालन आई.आई.टी. दिल्ली) ने की और प्रो. हरीश वानखेड़े (जे.एन.यू.) क्यूरेटर एवं मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। दलित-बहुजन-आदिवासी सिनेमा पर आधारित एक प्रदर्शनी ने इस महोत्सव की रूपरेखा तैयार की। इसमें जब्बार पटेल निर्देशित डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर और डेनज़ेल वॉशिंगटन निर्देशित द ग्रेट डिबेटर्स जैसी फ़िल्में दिखाई गईं। इसके अतिरिक्त ज्योति निशा के निर्देशन में बनी "अंबेडकर: देन एंड नाउ" और नेहा थोंब्रे द्वारा निर्देशित "व्हाट इज़ माई कास्ट?" जैसी डॉक्यूमेंट्रीज़ भी प्रदर्शित की गईं। इन फिल्मों ने दुनिया भर में गरिमा और न्याय के लिए चल रहे संघर्षों के अंतर्संबंधों को रेखांकित किया। फिल्म महोत्सव ने ‘डॉ. अंबेडकर का सिनेमा और समाज के लिए दृष्टिकोण’ विषयक परिचर्चा तथा ‘सिनेमा, प्रौद्योगिकी और बाज़ार’ पर आयोजित विशेष व्याख्यान के माध्यम से अपने विमर्श को और गहनता प्रदान की। इन सत्रों में श्री गिरीश वानखेड़े (मूवी ट्रेड विश्लेषक), संस्थान की ओर से प्रो. डिकेन्स लियोनार्ड (आई.आई.टी. दिल्ली), प्रो. अमिताभ बागची (आई.आई.टी. दिल्ली), प्रो. चारु मोंगा (आई.आई.टी. दिल्ली), प्रो. अमित थोराट (जे.एन.यू.), प्रो. रविकांत (सी.एस.डी.एस.) तथा फिल्मकार ज्योति निशा और नेहा थोंबरे ने अपने विचार साझा किए। इन चर्चाओं और प्रदर्शनों ने सिनेमा को शिक्षण, सामाजिक विमर्श और सामूहिक आनंद के एक प्रभावशाली मंच के रूप में रेखांकित किया।

कार्यशाला, कला और सामुदायिक सहभागिता

दिनांक 12 अप्रैल को अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति कर्मचारी कल्याण संघ द्वारा आई.आई.टी. दिल्ली संस्थान समुदाय के लिए एक चित्रकला प्रतियोगिता का आयोजन किया गया, जिसमें विभिन्न आयु वर्गों के प्रतिभागियों की सृजनात्मक अभिव्यक्ति को प्रोत्साहित किया गया। इस कड़ी में, प्रो. डिकेंस लियोनार्ड (आई.आई.टी. दिल्ली) द्वारा 13 अप्रैल को आयोजित अंग्रेज़ी भाषा संबंधी कार्यशाला में प्रतिभागियों ने भाग लिया। इसके बाद डॉ. राखी रथ (क्रेया विश्वविद्यालय) द्वारा आत्मविश्वास में वृद्धि विषयक एक कार्यशाला आयोजित की गई। इन दोनों ही कार्यशालाओं में अकादमिक परिवेश में अपनी बात रखने, अभिव्यक्ति और आत्मविश्वास से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की गई।

आई.आई.टी. दिल्ली संस्थान समुदाय के सदस्यों ने 14 अप्रैल को अंबेडकर जयंती के व्यापक राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में संसद भवन का दौरा किया। केंद्रीय पुस्तकालय में 15 अप्रैल को 'इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ दलित स्टडीज़' 
भारतीय दलित अध्ययन संस्थान(IIDS) द्वारा 'जाति संवेदनशीलता कार्यशाला' का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला में सामाजिक सद्भाव और कल्याण को बढ़ावा देने के तरीकों पर विचार-विमर्श किया गया।

अंबेडकर स्मृति व्याख्यान
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि और भारत के उच्चतम न्यायालय में स्वतंत्र अधिवक्ता एवं विधि विदुषी दिशा वाडेकर ने "कॉन्स्टिट्यूशनल मॉरैलिटी ऐज़ अ ट्रांसफॉर्मेटिव आइडियल: डॉ. अंबेडकर्स विज़न" विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने ज़ोर दिया कि हमें शिक्षा और नैतिकता के माध्यम से औपचारिक शब्दों से आगे बढ़कर संविधान की उस आत्मा को समझने की आवश्यकता है, जो अक्सर व्यक्त नहीं होती। साथ ही, उन्होंने श्रोताओं को डॉ. अंबेडकर के उस विचार की याद दिलाई कि संवैधानिक नैतिकता कोई स्वाभाविक भावना नहीं है, बल्कि इसे निरंतर विकसित करने और पोषित करने की आवश्यकता होती है।

प्रो. रंगन बनर्जी, निदेशक, आई.आई.टी. दिल्ली ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. अंबेडकर जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित सप्ताह भर की गतिविधियों का उल्लेख करते हुए कहा कि “आई.आई.टी. दिल्ली संस्थान में हम मानते हैं कि शैक्षणिक संस्थानों को पथ प्रदर्शक बनना चाहिए, ताकि हम यह दिखा सकें कि समाज को किस दिशा में जाना चाहिए… इस काम में डॉ. अंबेडकर के विचार हमें लगातार मार्ग दिखाते हैं।”

एक सजीव और समावेशी परिसर
सप्ताह का समापन 16 अप्रैल को विविध एवं महत्त्वपूर्ण गतिविधियों की एक शृंखला के साथ हुआ। इनमें ‘प्रिंट योर प्रीएम्बल’ स्क्रीन-प्रिंटिंग गतिविधि, जिसके अंतर्गत प्रतिभागियों ने स्वयं 250 प्रतियों का मुद्रण किया, आगंतुकों द्वारा अंबेडकर के प्रति अपने व्यक्तिगत विचार और भावनाएँ अभिव्यक्त करने के लिए रखी गई ‘एक शब्द में अंबेडकर’ नामक वॉल, डॉ. अंबेडकर के जीवन, दर्शन और योगदान पर आधारित पुस्तकों के एक सजीव एवं आकर्षक पुस्तक मेले, मालविका राज द्वारा प्रस्तुत मधुबनी कला की प्रदर्शनी और संथाली जनजातीय सांस्कृतिक प्रदर्शनी तथा ‘गरिमा मार्च’ का आयोजन शामिल रहा, जिसने समानता, सम्मान और सामाजिक न्याय के संदेश को सशक्त रूप से अभिव्यक्त किया।

प्रो. यशपाल जोगदंड (संकाय सलाहकार, जाति समानता पहल) ने व्यक्तिगत विकास और सामाजिक कल्याण के लिए डॉ. अंबेडकर के विचारों के साथ संवादपूर्ण और विचारशील जुड़ाव की अनिवार्यता को रेखांकित किया। प्रो. मनोजकुमार रामटेके (अध्यक्ष, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति प्रकोष्ठ) ने इन गतिविधियों में परिसर समुदाय की उत्साहपूर्ण भागीदारी की सराहना की।


फोटो कैप्शन: (तस्वीर: मुख्य अतिथि दिशा वाडेकर और प्रो. रंगन बनर्जी, निदेशक, आई.आई.टी. दिल्ली ने पुस्तक मेले और प्रदर्शनी का दौरा किया।)