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Publish Date: January 5, 2026

आई.आई.टी. दिल्ली और एम्स के शोधकर्ताओं ने एक निगलने योग्य सूक्ष्म उपकरण विकसित किया है जो छोटी आंत से सूक्ष्मजीवों के नमूने एकत्र करेगा।

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(अस्वीकरण:  साथ में दी गयी योजनाबद्ध/ एनीमेशन शैक्षिक उद्देश्यों के लिए प्रदत्त एक कलात्मक चित्रण है। यह पैमाने पर नहीं है और इसे वैज्ञानिक प्रक्रिया के शाब्दिक या पूर्ण चित्रण के रूप में नहीं माना जाना चाहिए। स्रोत: https://doi.org/10.1002/smll.202510289)

नई दिल्ली: कल्पना कीजिए कि आप एक छोटी गोली जैसे माइक्रोरॉबोट्स निगलते हैं जो पेट से होते हुए आंत तक पहुँचता है, सूक्ष्मजीवों और अणुओं को इकट्ठा करता है, और फिर शरीर से बाहर निकल जाता है। जो कभी विज्ञान कथा की तरह लगता था वह अब सच हो गया है। आई.आई.टी. दिल्ली के शोधकर्ताओं ने एक निगलने योग्य सूक्ष्म उपकरण को विकसित किया है जो छोटी आंत से सीधे बैक्टीरिया का सैंपल ले सकता है, जिससे मानव आंत माइक्रोबायोम का एक नया रास्ता खुल गया है।

सभी बैक्टीरिया हानिकारक नहीं होते। मानव शरीर की लगभग आधी कोशिकाएं माइक्रोबियल होती हैं। ये सूक्ष्मजीव हमारी आंतों में रहते हैं और भोजन पचाने, मूड को नियंत्रित करने और प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्युनिटी) को मजबूत बनाने में हमारी मदद करते हैं। फिर भी, उनका अध्ययन करना कठिन बना हुआ है। मौजूदा तरीके या तो आक्रामक प्रकृति (इनवेसिव)के हैं, जैसे एंडोस्कोपी अथवा इलियोस्टॉमी, या फिर अप्रत्यक्ष विधियों पर आधारित हैं, जो मल नमूनों पर निर्भर करती हैं और पाचन तंत्र के ऊपरी भागों की वास्तविक

परिस्थितियों को सटीक रूप से प्रदर्शित नहीं करतीं।

प्रो. सर्वेश कुमार श्रीवास्तव, प्रमुख शोधकर्ता, मेडिकल माइक्रोडिवाइसेज़ एंड मेडिसिन लेबोरेटरी (3MLab), जैवचिकित्सा इंजीनियरी, आई.आई.टी. दिल्ली ने समझाया "यह कहना कि हमारे शरीर में जीवित रोगाणुओं (माइक्रोब्स) का एक छिपा हुआ ब्रह्मांड है, कोई अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक सच्चाई है - हम इसे मानव माइक्रोबायोम कहते हैं। जैसे बाहरी अंतरिक्ष का पता लगाने के लिए रोवर्स का उपयोग करते हैं, वैसे ही मानव शरीर के आंतरिक स्थान का पता लगाने के लिए लघु (मिनिएचर) उपकरणों की आवश्यकता होती है।"  

प्रोफेसर सर्वेश श्रीवास्तव ने आगे कहा, "यह प्रोटोटाइप माइक्रोडिवाइस, एक बार निगलने के बाद, ऊपरी GI ट्रैक्ट के विशिष्ट हिस्सों से सूक्ष्मजीवों को स्वायत्त रूप से एकत्र कर सकता है, जिससे वहां रहने वाले सूक्ष्मजीवों की प्रजाति स्तर पर पहचान की जा सकती है, साथ ही अन्य बायोमार्कर का भी पता लगाया जा सकता है।" शोधकर्ताओं का कहना है कि उनका आविष्कार पारंपरिक स्टूल परीक्षण की तुलना में हमारी आंत के अंदर रहने वाले रोगाणुओं की बहुत स्पष्ट तस्वीर प्रदान करता है।
टीम ने अपना अध्ययन "A Small Pill-like Ingestible Microdevice for Site-specific Microbiome Sampling in the Upper GI Tract" शीर्षक से प्रतिष्ठित जर्नल स्मॉल में प्रकाशित किया। (शोध पत्र लिंक:
https://doi.org/10.1002/smll.202510289; लेखक: अंशुल नेमा, देबजीत धर, वेंकट साई रेड्डी रामिरेड्डी, कुमारी प्रियम, समग्र अग्रवाल, सर्वेश कुमार श्रीवास्तव)
एक बार निगलने के बाद, गोली पेट में रहती है। यह केवल आंत में बैक्टीरिया एकत्र करने के लिए खुलती है, फिर आंत से गुजरते समय यह नमूने (सैंपल) को सुरक्षित रखने के लिए खुद को फिर से बंद कर लेती है। टीम ने पहले ही पेटेंट दायर कर दिया है और चावल के दाने से बड़े माइक्रोडिवाइस का उपयोग करके एक पशु मॉडल में अपनी गट-सैंपलिंग तकनीक को मान्य किया है! अब इस प्लेटफ़ॉर्म तकनीक को आवश्यक मंजूरियों के बाद क्लिनिक में भारतीय मरीजों की सहायता के लिए आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।”

एम्स नई दिल्ली के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी और ह्यूमन न्यूट्रिशन यूनिट के सह-वरिष्ठ लेखक डॉ. समग्रा अग्रवाल ने बताया, “छोटी आंत स्वास्थ्य और बीमारी में अहम भूमिका निभाती है। वहां से निकलने वाले सूक्ष्मजीवों और रसायनों को समझना प्रारंभिक बीमारी का पता लगाने, पुरानी बीमारियों की निगरानी और अधिक लक्षित उपचार विकसित करने में महत्वपूर्ण हो सकता है।”

यह परियोजना भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) द्वारा वित्तपोषित है।

शोधकर्ता का ईमेल: प्रो. सर्वेश कुमार श्रीवास्तव, जैवचिकित्सा इंजीनियरी, आई.आई.टी. दिल्ली — sksr@cbme.iitd.ac.in.

प्रकाशन दिनांक: 17 दिसम्बर, 2025