परिचय
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली (भा.प्रौ.सं. दिल्ली), भारत में विज्ञान, इंजीनियरी एवम् प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रशिक्षण, अनुसंधान एवम् विकास के उत्कृष्ट केन्द्र के रूप में स्थापित तेईस भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों में से एक है।
सन् 1961 में कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग के रूप में स्थापित, इस संस्थान को बाद में “प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम 1963’’ के अन्तर्गत राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित किया गया था तथा इसका नया नाम “भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली’’ रखा गया। तत्पश्चात इसे मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया और इसे अपनी शैक्षणिक नीतियाँ निर्धारित करने, अपनी परीक्षाएँ स्वयं आयोजित करने तथा अपनी उपाधियाँ प्रदान करने का अधिकार प्राप्त हुआ।
भा.प्रौ.सं. दिल्ली के प्रारम्भ से इंजीनियरी, भौतिक विज्ञानों, प्रबन्ध और मानविकी एवं समाज विज्ञानों सहित विविध विद्याशाखाओं में अब तक 60,000 से अधिक विद्यार्थियों ने डिग्री प्राप्त की हैं। इनमें से लगभग 5070 ने विद्यावाचस्पति (पी.एचडी.) की उपाधि प्राप्त की है। बी.टेक. डिग्री प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों की संख्या 15,738 से अधिक हैं। शेष विद्यार्थियों ने इंजीनियरी, विज्ञान एवं व्यवसाय प्रशासन में निष्णात डिग्री प्राप्त कीं। ये अल्युमनी आज वैज्ञानिकों, प्रौद्योगिकीविदों, व्यवसाय प्रबन्धकों और उद्यमियों के रूप में कार्यरत हैं। अनेक ऐसे अल्युमनी भी हैं जो अपनी मूल विद्याशाखा से निकल गए हैं तथा प्रशासनिक सेवाओं में चले गए हैं अथवा सक्रिय राजनीति में हैं अथवा गैर सरकारी संगठनों में कार्य कर रहे हैं। ऐसा करते हुए उन्होंने राष्ट्र- निर्माण में और पूरे विश्व में औद्योगिकीकरण में महत्वपूर्ण रूप से योगदान किया है।
इतिहास स्नैपशॉट
संस्थान का इतिहास
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों की अवधारणा को पहली बार प्रमुख भारतीय उद्योगपति और राजनेता “श्री नलिनी रंजन सरकार” के नेतृत्व में एक समिति द्वारा प्रस्तुत किया गया था। 1945 में तत्कालीन वायसराय की कार्यकारी परिषद (शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि विभाग) के सदस्य सर जोगेंद्र सिंह ने 'भारत में उच्च तकनीकी संस्थानों के विकास के लिए समिति' का गठन किया था। श्री सरकार समिति की सिफारिशों के बाद, वर्ष 1950 में पहला भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान खड़गपुर में स्थापित किया गया था। श्री सरकार ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया था कि ऐसे संस्थान देश के विभिन्न भागों में भी शुरू किए जाने चाहिए। भारत सरकार ने सरकार समिति की इन सिफारिशों को स्वीकार करते हुए मदद के लिए तत्पर मित्र देशों की सहायता से, और अधिक प्रौद्योगिकी संस्थान स्थापित करने का निर्णय लिया। सहायता का पहला प्रस्ताव यू.एस.एस.आर. से आया, जो बॉम्बे में यूनेस्को के माध्यम से एक संस्थान की स्थापना में सहयोग के लिए सहमत हुए। इसके बाद, पश्चिम जर्मनी, अमेरिका और ब्रिटेन के सहयोग से क्रमशः मद्रास, कानपुर और दिल्ली में प्रौद्योगिकी संस्थानों का गठन किया गया। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान गुवाहाटी की स्थापना 1995 में की गई थी और रुड़की विश्वविद्यालय को 2001 में आई.आई.टी. रुड़की में बदल दिया गया था।
भारत सरकार ने दिल्ली में एक प्रौद्योगिकी संस्थान की स्थापना में सहयोग के लिए ब्रिटिश सरकार के साथ बातचीत की। ब्रिटिश सरकार इसके लिए सैद्धांतिक रूप से सहमत थी, लेकिन वह आरंभ में इसे सीमित स्तर पर शुरू करना चाहती थी। अत: यह तय हुआ कि उनकी सहायता से दिल्ली में एक इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी महाविद्यालय की स्थापना की जाए। यू.के. सरकार और लंदन स्थित फेडरेशन ऑफ़ ब्रिटिश इंडस्ट्रीज़ की मदद से दिल्ली इंजीनियरिंग कॉलेज ट्रस्ट नामक एक ट्रस्ट बनाया गया। बाद में, एच.आर.एच. प्रिंस फिलिप, ड्यूक ऑफ़ एडिनबर्ग ने अपनी भारत यात्रा के दौरान, 27 जनवरी, 1959 को दिल्ली के हौज़ खास में इंजीनियरिंग और टेक्नॉलजी कॉलेज की आधारशिला रखी।
कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नॉलजी को सोसायटी पंजीकरण अधिनियम 1860 (अधिनियम संख्या XXI) के तहत 14 जून 1960 को एक सोसायटी के रूप में पंजीकृत (पंजीकरण संख्या S1663, सत्र 1960-61) किया गया। यहाँ पहला प्रवेश 1961 में दिया गया था। विद्यार्थियों को 16 अगस्त 1961 को कॉलेज में रिपोर्ट करने के लिए कहा गया था और वैज्ञानिक अनुसंधान और सांस्कृतिक मामलों के मंत्री प्रोफेसर हुमायूं कबीर द्वारा 17 अगस्त 1961 को कॉलेज का औपचारिक उद्घाटन किया गया था। यह कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध था।
अधिनियम की धारा 4 के अनुसार, प्रत्येक संस्थान एक निगमित निकाय होगा जिसका स्थायी उत्तराधिकार और एक सामान्य मुहर होगी और वह अपने नाम से मुकदमा कर सकता है और उस पर मुकदमा किया जा सकता है। प्रत्येक संस्थान का गठन करने वाले निकाय में एक अध्यक्ष, एक निदेशक और बोर्ड के अन्य सदस्य होंगे। आई.आई.टी. दिल्ली प्रौद्योगिकी संस्थान अधिनियम, 1961 के तहत काम करने वाला एक स्वायत्त वैधानिक संगठन है, जिसे प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 1963 और उसके तहत बनाए गए कानूनों द्वारा संशोधित किया गया है। संस्थान के मामलों के सामान्य देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी बोर्ड ऑफ गवर्नर्स को दी गई है। बोर्ड ऑफ गवर्नर्स अपनी स्थायी समितियों-वित्त समिति, भवन और कार्य समिति और ऐसी अन्य तदर्थ समितियों, जिन्हें समय-समय पर विशेष मुद्दों पर विचार करने के लिए गठित किया जाता है, के माध्यम से कार्य करता है। संस्थान में निर्देश, शिक्षा और परीक्षा के मानकों के रखरखाव के लिए नियंत्रण और सामान्य विनियमन सीनेट में निहित है। सीनेट अकादमिक नीतियों के निर्माण और अध्ययन के पाठ्यक्रमों और परीक्षा की प्रणाली को डिजाइन करने के लिए ज़िम्मेदार है। सीनेट अपने स्थायी बोर्डों/ समितियों और उप-समितियों के माध्यम से कार्य करता है जिन्हें समय-समय पर उत्पन्न होने वाले विशिष्ट मामलों पर विचार करने के लिए गठित किया जाता है।